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मखाना है मिथिला की पहचान

बेनीपुर, दरभंगा । मिथिला में माछ, पान और मखाना की बहुतायत है। यहां की लोक संस्कृति में इसका खासा महत्व है। स्वयंसेवी संस्था अभ्युदय के राष्ट्रीय अध्यक्ष विभय कुमार झा ने कहा कि मखाना केवल मिथिला की पहचान है। कोई कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन यह हमारी विशिष्ट पहचान है और रहेगी। इसलिए जब मखाना के जीआई टैग की बात आती है, तो हम समस्त मिथिलावासी की यही मांग और अधिकार है कि मिथिला के नाम से ही जीआई टैग मिले। 

विभय झा ने कहा कि मिथिला का मखाना उसकी एक भौगोलिक पहचान का संकेत है । अब इसे बदल कर बिहार का मखाना जी आई टैग करने संबंधी सबौर कृषी विस्वविद्यालय की पहल, कतई स्वीकार्य योग्य नहीं है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय सम्पूर्ण मिथिलांचल की पहचान पर प्रहार करने जैसा है।

विभय कुमार झा ने कहा कि इसका कोई तुक नहीं है की बिहार मखाना नाम से जीआई टैग लिया जाए। मिथिला मखाना नाम से जीआई टैग मिलने पर भी यह बिहार राज्य के लिए ही फायदेमंद होगा। “मगही पान” के नाम पर जीआई टैग लिया जा सकता है, उस वक्त कोई नहीं कहता की “बिहारी पान” के नाम पर टैग लिया जाए। लेकिन मखान को आप बिहार मखाना के तौर पर प्रेजेंट करना चाहते हैं। मिथिला शब्द से इतनी समस्या क्यों है ? मिथिला के पहचान से जुड़े हरेक चीज में से आप मिथिला शब्द क्यों निकाल देना चाहते हैं ? आप मिथिला के हिस्से का हक खाना चाहते हैं।

अभ्युदय के राष्ट्रीय अध्यक्ष विभय कुमार झा ने कहा कि मखाना का उत्पादन 75% से अधिक मिथिला क्षेत्र में होता है, मखान मिथिला का पहचान माना जाता है, यहां का मूल फसल है। यदि इसका जीआई टैग “मिथिला मखान” नाम से लिया जाता है तो इस पर मिथिला क्षेत्र का अधिकार होगा। इसे उपजाने व प्रोसेस करने की विधि वो मानी जाएगी जो मिथिला क्षेत्र में उपयुक्त होती है। इससे मिथिला के किसानों, व्यापारियों को फायदा होगा और भविष्य में क्लस्टर बेस्ट एग्रीकल्चर सहित केंद्रीय योजनाओं का लाभ मिथिला को मिलता।
                   

संवाददाता सुनील झा
मो० न० 6202436761

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