नवरात्रा विशेषांक - नवरात्रि में पूजा की विधि । - BENIPUR NEWS

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Sunday, 24 September 2017

नवरात्रा विशेषांक - नवरात्रि में पूजा की विधि ।

नवरात्रा विशेषांक - नवरात्रि में पूजा की विधि । दुख पीड़ा को नष्ट करने के लिए मां दुर्गे की उतारी जाती है आरती ।

  एम राजा की रिपोर्ट 

      दरभंगा जिला के कोरथु  गांव निवासी पंडित व लेखक डॉक्टर  जयप्रकाश "जनक' से दुर्गा पूजा स्पेशल रिपोर्ट पर उनसे हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि यू तो वर्षों भर पूजा की जाती है। वर्षों भर पूजा पांच उपचारों से   किया जाता है परंतु नवरात्री में पूजा 16 उपचारों से की जाती है। ऐसे तो पूजा की तीन श्रेणी है पांच उपचारों की पूजा , 10 उपचारों की पूजा एवं सोलो उपचारों की पूजा , 16 उपचारों की पूजा। मिथिला में 10 उपचारों वाली पूजा नहीं होती है यहां 5 एवं 10 उपचारों की पूजा होती है नवरात्रि में 16 उपचारों वाली पूजा होती है जिसमें आसन, स्वागत,अर्घ ,  जला , आचमन, मधुपर्क , आचमन, स्नान, कपड़ा,  आभूषण , गंध , पुष्प, धूप , दीप, नैवेदय एवं वंदना शामिल है। अब अगर विद्वानों की माने तो आरती शब्द का चर्चा इसमें नहीं है जब उनसे आरती के विषय में बात की गई उन्होंने कहा प्रतिमा के सामने दीपदान या कपूर दीपक घुमाना ही आरती है। " आरत " आरत से मुराद दुख , पीड़ा व दुश्मन से है तो वहीं  आरत संस्कृत शब्द है । अपने दुख पीड़ा से मुक्ति के लिए की जाती है आरती, आरती प्रतिमा के पांव से शुरु होकर मस्तक पर अंत किया जाता है जिसमें प्रतिमा के सामने सात बार दीप को फेरा जाता है आरती का सांस्कृत नाम आरात्रिक भी है आरती कोनो देव मूर्ति व शिष्ट व्यक्ति को दिखाया जाता है। शिष्ट व्यक्ति का मतलब गुरु से है गुरु का भी आरती उतार सकते हैं इस में कोई बुराई नहीं है। आसीन महीने के पहले 15 दिन को पितृ  पक्ष कहा जाता है इन दिनों मरे हुए पूर्वजों की भटकती आत्मा की मुक्ति के लिए पानी देना, एवं पिंड दान देना जिससे उनकी भटकती आत्मा को मुक्ति मिलती है। तो वहीं दूससे 15 दिन को देवी पक्ष कहा जाता है इन दिनों देवी की पूजा अर्चना की जाती है इन 15 दिनों तक देवी अपने धाम से उतरकर धराधाम पर आती है और 15 दिनों में भी मात्र 5  दिन जो काफी खास है ग्रंथों ने माना है कि मूल नाम के नक्षत्र के दिन यानी कलश के छठे दिन देवी का आगमन होता है और जाना (वापसी) श्रावना नक्षत्र के दिन ज होता है मतलब विजया दशमी के दिन। आगे उन्होंने एक बहुत बड़ा रहस्य को बताते हुए कहा कि इस वर्ष नक्षत्र के हिसाब से  देवी के आने और जाने को शुभ नहीं माना जा रहा है क्योंकि देवी के आने की सवारी से ही सुभ और अशुभ का ज्ञात हो जाता है इस वर्ष " देवी डोली पर सवार होकर आई है और मुर्गे पर चढ़कर देवी जा रही है " डोली पर चढ़कर आना भी सुभ नही है और नही मुर्गे पर चढ़ कर जाना शुभ है । डोली पर चढ़ का आने से महामारी , मरण जैसी स्थिति पैदा होगी और जाने से विकला मतलब परेसानी । इसीलिए पूजा अर्चना की जाए भगवान को मनाया जाए। देवी के आने की सवारी का महत्व  शशि सूर्ये गजारुढा , शनि भौमे तुरंगमा, गुरौ  शुक्रे च  दोलाया, बुधे नौका प्रकीत्रिताए  रवि सोम-  हाथी की सवारी (वर्षा की संभावना अधिक)  मंगल शनि - घोड़ा की सवारी (युद्ध राजाओं का ) गुरु शुक्र - डोली की सवारी मतलब (मरण)  बुध - नाव की सवारी  जो सबसे बेहतर मानी जाती ।

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