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हेरा रहल हरयरी....



हेरा रहल हरयरी....

हेरा रहल हरयरी, हम त औना रहल छि ।
खेत बनल एछ झाम , तैयो कोरा रहल छि ।
सुखी गेल अछी धान, तइयो पटा रहल छि ।
तें ने उपजे चास, विधि किये कना रहल छि ।

क बैठलों हम गलती तैयो अछि ठेसी ।
देलिय ज़े हम खाद , से छले ने देसी ।
अपन बथान तर परले रहले, गोबर ज़े देसी ।
तखन कोना ने परती रहते , देशक खेती ।

बकुट धेयर अछि धान, तकरे लुझी रहल छि ।
अपन स्वदेशक कोठी में हम मुस रखे छि ।
आनक देश में जा जा कोठी खूब भरे छि ।

खाय विदेशी अन्न लोक नहीं पचा रहल अछि ।
भोगक रोगे राष्ट्रक काया सुखा रहल अछि ।
आ , तैयो राष्ट्र विकाशक वर्षी मना रहल अछि ।
तैयो राष्ट्र विकाशक वर्षी मना रहल अछि ।
( रजनीश प्रियदर्शी )

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